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अन्नाटीम को चुनाव अवश्य ही लड़ना ही चाहिए

Posted On: 28 Jun, 2012 Others में

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अन्नाटीम को चुनाव अवश्य ही लड़ना ही चाहिए
क्या अन्नाटीम केवल अपने इस आन्दोलन के बल पर कुछ सार्थक जुटा सकेगी इसका जवाब होगा कदापि नहीं क्योकि अन्ना टीम ने जो मार्ग चुना है उससे समूचा देश उनकी ईमानदार प्रतिबधता का कायल और समर्थक अवश्य हो गया है और प्रजातंत्र में जनशक्ति ही सर्वोच्च शक्ति भी अवश्य है परन्तु इस सर्वोच्च शक्ति की कुछ बहुत सीमित भूमिका है यह बात समझना बेहद जरूरी है यह जनशक्ति सडको पर विशाल जुलुस तो निकाल सकती है ,सडको पर नारे तो लगा सकती है परन्तु इसके अलावा सडको पर आपनी शक्ति के प्रर्दशन से व्यवस्था की यथास्थिति मे कोई आमूलचुल परिवर्तन नही कर सकती प्रजातन्त्र मे उसकी जो सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है वह सड़को पर नही बल्कि मतदान केन्द्र पर है यहाँ वह अपने वोट से आपनी पसन्द की सरकार बना सकती है और यह एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक संयोग है कि आज अन्नाटीम जनशक्ति की पहली पसंद है उसकी ईमानदारी और राष्ट्रभक्ति पर जनता को पूरा भरोसा है लेकिन खेद है कि अन्ना टीम राजनीति में नहीं है उसे राजनीति से सख्त परहेज है आज अन्ना टीम के लिए इस सर्वोच्च शक्ति की इस सबसे अधिकतम महत्वपूर्ण भूमिका का कोई भी उपयोग नहीं है जनशक्ति की पहली दो भूमिकाऐ केवल धुंध कोलाहल और झाग तो अवश्य पैदा कर सकती है परन्तु इसके बल पर कोई ठोस परिवर्तन नही कर सकती है प्रजातंत्र में ठोस परिवर्तन केवल चुनी हुई सरकार ही कर सकती है और यह एक अकाट्य सत्य है इसके अलावा बाकि सब धोखा है और इस बात को अन्नाटीम भी जितनी जल्दी समझ ले और स्वीकार कर ले तो परिवर्तन के इस अभियान को ठोस आधार मिल जायेगा और यह जनशक्ति का अभूतपूर्व समर्थन देश के सच्चे काम आ जायेगाऔर लेखे लग जायेगा
अन्नाटीम को इस बात से संकोच हो सकता है कि आन्दोलन के प्रारम्भ से ही एक कुटिल रणनीति के तहत निहीत स्वार्थीतत्वो द्वारा समय समय पर यह कहा जाता रहा है कि अन्नाटीम का छुपा हुआ राजनैतिक एजेंडा है और इस बात का उच्चारण एक गंदे आरोप की तरह से किया जाता रहा है और अगर अन्नाटीम चुनाव मैदान में कूद जाती है तो उनकी बात उनके शब्दों में उनके आरोप सही साबित हो जायेगे लेकिन राजनीति मे कोई बुराई नही है बुराई है भ्रष्ट और गन्दी राजनीति मे चन्द बेईमान राजनेताओ के अलावा कोई भी अन्नाटीम के इस निर्णय को गलत नही ठहराएगा बल्कि देशभर मे इसका भरपूर स्वागत होगा और बिलकुल यह कहा जायेगा कि यह तो अति आवश्यक कदम था

अन्ना टीम चुनाव लड़कर सत्ता में आती है जो सुनिश्चित है तो पहली बार देश की सत्ता पूर्णतया ईमानदार लोगो हाथो में होगी देश के शीर्ष पर ऐसे लोग होंगे जो सच्चे मन से इस देश का चेहरा बदलना चाहते है और उन्हें देशहित के निर्णय को अमल में लाने के लिए किसी का मुँह देखने की आवश्यकता नहीं होगी बल्कि वह देशहित के तमाम निर्णय खुद अविलम्ब लागू कर सकेगी
इसके लिए तमाम सुधिजनो को अन्नाटीम को सहमत करने का प्रयास करना चाहिए
अगर अन्नाटीम चुनाव लड़ने के मेरे सुझाव से सहमत हो जाती है तो उसे कुछ चीजो के बारे में निर्णय कर कुछ बातो को तय और साफ करना होगा क्योकि लार्ड एक्टन के कथन में एक व्यवहारिक सच्चाई है कि सत्ता व्यक्ति को भ्रष्ट बनाती है यह एक चुम्बकीय बुराई है और सत्ता प्राप्त होते ही इस बुराई का चुम्बकीय आकर्षण अपनी और खीचने का हर सम्भव प्रयास शुरू कर देता है इसके आकर्षण से आकर्षित होने से इंकार करने वालो को यह तकलीफ भी देता है परन्तु अन्नाटीम को हर कदम पर इससे बचने ,सावधान रहने की आवश्यकता होगी इसके अलावा कोई चाहे तो भी भ्रष्टाचारमें लिप्त न हो सके ऐसी ठोस आयोजना पूर्व में ही कर उसके हर बिंदु का सम्पूर्ण पारदर्शिता के साथ अपने घोषणा पत्र में खुलासेवार जिक्र करना आवश्यक होगा
इस कदम पर अति सावधानी पूर्वक कठोर अमल इसलिए भी आवश्यक है की आज हम कोर कमेटी के नैतिक चरित्र के प्रति तो आश्वस्त है परन्तु जब चुनावी राजनीति में भाग लिया जायेगा तो लाखो लोग इसमे जुड़ेगें और चुनाव जीत कर उनके हाथो में अधिकारों की शक्ति होगी वह किसी भी तरह से गलत हाथो में न पहुंचे और पहुंचती भी है तो वह चाहे तो भी कोई गलत कार्य न कर सके ऐसी ठोस आयोजना आज ही करना आवश्यक है इसलिए यह सारी सतर्कता बेहद आवश्यक है एक और सतर्कता बेहद आवश्यक है उसका जिक्र बाद मे समय आने पर करेगे

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

anuradh chaudhary के द्वारा
July 3, 2012

गिरीश जी आपका लेख अतिउत्‍तम और सच्‍चाई को प्रदर्शित करते हुए लिखा गया है। यह सत्‍य है कि प्रदर्शन मे भीड जुटने से निर्णय नही बदलवाये जा सकते है लेकिन राजनीति के अलावा भी रास्‍ते है जो राजनीति से ज्‍यादा प्रभावी है। गिरीश जी मैने राजनीति के माध्‍यम से समाज मे कुछ बदलाव लाने की कोशिस की बदलाव तो नही आया मुझे अपने को बदलने पर मजबूर होना पड रहा है। राजनीति मे स्‍थापित लोग साम दाम दण्‍ड और भेद के माध्‍यम से अपना पद बचाये रखने मे सफल हो रहे है। यही लोग जो भ्रष्‍टाचार से ग्रस्‍त है जब वोट डालना होता है तो वे जाति धर्म और पैसे के लिये वोट देते है सुशासन के लिये नही। इसलिये अन्‍ना टीम का सामाजिक आन्‍दोलन ही आज के परिवेश मे छीक है। आवश्‍यकता है एक सकारात्‍मक शुरूआत की।

dineshaastik के द्वारा
June 29, 2012

आपकी बातों से पूर्णतः सहमत……


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