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मुझे यह समझ में नहीं आता

Posted On: 6 Jul, 2012 Others में

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मुझे यह समझ में नहीं आता
अपने आप को जीनियस नहीं कह सकता क्योकि वास्तव में मै नहीं हूँ परन्तु हमारे तमाम नीति नियंता और उनके तमाम थिंक टेंक सलाहकारों में एक अति विचार शून्यता को स्पष्ट रूप से अवश्य महसूस करता हूँ और संदेह यह भी होता है कि कोई इतना अहमक कैसे हो सकता है अर्थात इस विचार शून्यता में कुछ बनावट का अंश भी महसूस होता है और जो भी हो इस सब का कुल जमा नतीजा यह निकलता है कि देश कि जनता हलकान है परेशान है बेहद दुखी है और परिणाम स्वरूप प्रतिदिन हजारो कि संख्या में लोग आत्महत्याए कर रहे है या छोटी मोटी बातो के लिए एक दुसरे की जान भी ले रहे है . प्राण चाहे स्वयं के हो या दुसरे के हो ,अगर लिए जाते है तो ,यह इन्तहां है, जो बता रही है कि पानी सर से ऊपर हो चला है और जब मै पाता हूँ कि यह सब एक व्यापक वैचारिक शून्यता कि वजह से हो रहा है तो आश्चर्य मिश्रित दुःख होता है कि इनकी वजह क्रत्रिम समस्याये है एक वैचारिक शून्यता है क्योकि हम सहज रूप से पाते है कि उनमें से अधिकांश समस्याओ का समाधान और निवारण तो कुछ सरल उपायों और प्रयासों को ईमानदारी से लागू कर आसानी से हो सकता है लेकिन वह नहीं किया जा रहा है उसके स्थान पर सरल व साधारण बातो को , समस्याओ को ऐसा पहाड़ जैसा विकराल बना कर खडा कर दिया गया है कि इनसे पार न पाने की वजह से घबराकर हर दिन हजारो लोग आत्महत्या जैसे भयानक और शर्मनाक कदम उठाने को विवश हो रहे है
हमारे प्रधानमन्त्री मनमोहंनसिह अर्थशास्त्री है मुझे अर्थशास्त्र की बात शायद नहीं करनी चाहिए क्योकि मुझे इसकी बाते समझ में ही नहीं आती है जो सहज दो और दो चार होता है वही यह शास्त्र उस दो और दो को चार के स्थान पर छह या शून्य भी बना सकता है इसकी महिमा अपरम्पार है , इसलिए मुझे यह विषय कभी प्रिय नहीं रहा मै कभी यह नहीं समझ पाता हूँ कि जिस देश की जनता सेकड़ो कि संख्या में प्रतिदिन परेशान और विवश होकर आत्महत्याये कर रही है और वह भी वर्षो से लगातार यह शर्मनाक दुखद कृत्य नियमित चल रहा है ,वह देश विकास दर में वृद्धि कैसे किस आधार पर कर रहा है और इसका गर्व कैसे महसूस कर खुश हो सकता है ? एक ठोस सच्चाई को झुठलाकर क्रत्रिम पैमाने के एक आधा प्रतिशत कम अधिक होने पर खुश और संजिदा हो सकते है ?मुझे यह समझ में नहीं आता कि हम पाँच रूपये किलो आलू को निर्यात कर पाँच सो रुपये किलो का ब्रांडेड आलू चिप्स कैसे आयात कर सकते है ? हम हमारे देश को महंगाई भुखमरी में झोंककर खाद्यान्न का निर्यात कैसे कर सकते है और वह भी उन देशो को नहीं जहाँ मानवीयता के आधार पर हमसे भी कही अधिक आवश्यकता है ,नहीं बल्कि उन देशो को जो उसकी जमाखोरी कर उसका विश्व में क्रत्रिम आभाव पैदा कर हमें या किसी अन्य देश को दुगने तिगुने भावो पर बेच देंगे और उसे हम खरीदेंगे या वे उसका कोई महंगा परिष्कृत रूप आकर्षक पेकिंग में पाँच सो गुना अधिक कीमत में हमें बेच देंगे.हमारे यहाँ लाखो लोग पर्याप्त भोजन के आभाव में भूखमरी से मर जाते है और हम लाखो टन अनाज को भंडारण के आभाव में सड़ जाने कैसे दे सकते है ?
हमारी अर्थव्यवस्था पर ईधन सबसे अधिक भारी रहता है हर बजट के पूर्व तेल के बढ़ते भावो का जरुर रोना रोया जाता है और सभी चीजो के भाव बढ़ा दिए जाते है .महंगाई कि सभी वजहों में इसे सबसे बड़ी और ऐसी वजह माना जाकर सारा व्यवहार किया जाता रहा है हम तेल निर्यातक देशो के दुनिया भर के नाज नखरे विवशता पूर्वक उठाते है और वैश्विक मामलो में उनके सही या गलत मामलो में ख़ामोशी से अपना सर हिलाते है कि कही वे नाराज न हो जाए और यह कोई खेरात में नहीं बल्कि उनके तय किये गए महंगे भावो और शर्तो पर याचक कि तरह यह तेल गैस खरीदते है और उसके आधार पर पूरे देश में महंगाई का कहर बरपाते ही चले जाते है तो मुझे यह समझ में नहीं आता कि देश का अति कीमती धन उससे भी कीमती आत्मसम्मान और उससे भी कीमती हमारी जनता का सुख चैन इन सबका इतना बड़ा बलिदान देने वाले हम आश्चर्य हैकि लगभग वर्ष भर भरपूर मात्रा मेंमुफ्त मेंउपलब्धसहजप्राप्तसोरउर्जा को इतना अनदेखा अनुपयोगी केसे रह जाने दे सकते है ,रह जाने दे रहे है ? मै यह बात सौर उर्जा के उपयोग को सरल सस्ता बनाने के लिए किये जा रहे बेहद मंद गति के प्रयासों के सफल हो जाने के बाद की नही आज की कर रहा हूँ जो जैसा सहज सुलभ है , उपलब्ध है जिसका हम आज ही उपभोग कर सकते है और अपनी आधी से अधिक तेल और बिजली की बचत कर सकते है एक तरह से हम हमारे लगभग सत्तर प्रतिशत आर्थिक दबाव को खत्म कर सकते है विवशता भरी आर्थिक पराधीनता से मुक्त हो सकते है वह हम दिलोजान से क्यों नहीं कर रहे है ,मुझे समझ नही आता है ?
हम क्यों नहीं कर रहे है इसका कारण तो नहीं पता पर हाँ पर नहीं कर रहे है यह तय है उदाहरण प्रस्तुत है –
आज बिजली का एक बड़ा उपयोग पानी को गर्म करने में होता है सोलर गीजर इस काम को बहुत सफलता पूर्वक अंजाम दे सकते है और इसमें खर्च की जा रही बिजली को पूरी तरह से बचा सकते है परन्तु यह लगाना बहुत महंगा सेटअप पड़ रहा है क्योकि इस पर टैक्स और मुनाफा बहुत है और हर व्यक्ति इस खर्च को वहन नही कर सकता .
भोजन बनाने के लिए महंगी आयातित गैस का उपयोग किया जाता है और बार बार उसकी कीमते बढ़ाई जाती रहतीहै सोलरकुकर,सोलरभट्टी आदि को क्यों सस्ता नहीं बनाया गया क्यों जनता को सस्ते में उपलब्ध नहीं करवाया जा सकता क्यों जनता को इसके लिए समझाकर आकर्षित किया गया
हमारे देश में आज करोडो दो पहिया चार पहिया वाहन है प्रति वर्ष इसमें लाखो की वृद्धि हो रही है इनमे हम खून से भी महंगा आयातित पेट्रोल फूंक रहे है जो हमारी आर्थिक स्थिति को बुरी तरह से निचोड़ रहा है इसकी जिम्मेदार हमारी सरकार ही है आज से दो दशक पूर्व से भारत में चाइना की ई -बाइक आ गयी है और सफलता पूर्वक चल भी रही है सोलर बाइक गाड़ी भी आ गयी है लेकिन हमारी सरकार ने कभी इस और ध्यान देने की कोई जरुरत ही नहीं समझी सरकार को चाहिए था कि वह न सिर्फ इस मामले में चीन से आगे निकलती हम तो मौलिक प्रतिभा सम्पन्न देश है हम तो बल्कि मुफ्त जैसी कीमतो में जनता को उपलब्ध करवा सकते थे
हमारे उद्योगपतियो को अनिवार्य रूप से सोलर एवं ई -बाइक के उद्योग डालने और सोलर एवं ई -बाइक का उत्पादन करने का आदेश दिया जाता और इस पर एक पैसा भी टैक्स नहीं लगाया जाता बल्कि भरपूर सब्सिडी दी जाती और प्रतिदिन इसमें माडीफिकेशन किया जाता इसको चलाने के लिए जनता को हर तरह से प्रोत्साहित किया जाता तो आज हमारी सडको पर महंगे पेट्रोल के स्थान पर सोलर एवं ई -बाइक ही नजर आती चार पहिया वाहनों में भी हम यह प्रयोग आगे बढकर कर सकते थे जो हमारी सरकार ने नहीं किया सरकार ने तो उलटे उस पर इतनी ड्यूटी टैक्स लाद दिए कि वह अपवाद स्वरुप ही दिखाई दे रही है और भारत के किसी उद्योगपति ने इसमें कोई रूचि नहीं ली वैसे इसकी टेक्नोलाजी बहुत सस्ती है इसमें सोलर पेनल ,एक मोटर, एक बेटरी , एक चार्जर ,और गाड़ी का बाड़ी स्ट्रेक्चर सही लागत पाँच हजार से सात हजार परन्तु फिर भी चालीस पचास हजार में बेचीं जा रही है क्यों क्या कोई किसी का ऐसा निहित स्वार्थ है जो यह नहीं चाहता कि यह किसी भी तरह से आम प्रचलन में आये ?
सोलर शक्ति का कितना सही भरपूर उपयोग किया जा सकता है यह देखना हो तो इंदौर कि बरली सेवा संस्थान मे हम देख सकते है वहां लगभग दो सौ लोगो का खाना सोलर कुकर सोलर भट्टी से न केवल बनाया जाता है बल्कि आदिवासी बच्चियों को अपने घरो में इसका उपयोग करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है

अगर मुफ़्त मे भी जनता को दे दिया जाता तो कुछ लीटर तेल या कुछ माह की गैस की सबसिड़ी के मूल्य मे सब काम हो जायेगा सरकार पर कोई बोझ भी नही पड़ता परन्तु नही किया गया क्यो ?? क्या किन्ही निहीत स्वार्थो को लाभ पहुँचाने के लिये ?

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
July 9, 2012

बढ़िया , सटीक और समाज के हित से जुड़ा लेख !

Chandan rai के द्वारा
July 8, 2012

गिरीश जी , आपके विचारों से शब्दश सहमत ,देश की आवाज की बेबसी बस आलेखों में सिमट कर रह जाती है , और सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता ! बहुत सुन्दर आलेख !

yamunapathak के द्वारा
July 7, 2012

काश यह लेख सत्ता के नुमाइंदे भी पढ़ लेते.आपने बहुत ही विचारनीय बातें मंच पर रखी हैं.

pritish1 के द्वारा
July 7, 2012

सप्रेम…….! इस विचार शुन्यता का परिणाम हम सबको भुगतना है……….समय अब भी है हमें कुछ करना चाहिए क्यों बनाया हमने ऐसा समाज……..अपने विचार दें…… http://pritish1.jagranjunction.com/2012/07/07/kyun-banaya-hamne-aisa-samaj/


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